Tuesday, September 22, 2015

काश जनता अब भी समझ जाए।


सत्ता ने सिखाया कि सामंतवाद से लड़ो ,
यही तुम्हारे दुश्मन हैं ,
तुम्हारी रोटी ,कपडे और मकान ,
ये छीन लेते हैं ,
और तुम बदहाल जीवन जीते हो ,
नक्सल बनो ,लूटो और न्याय पाओ ,
जनता नक्सल बनी ,
लूट हुई ,हत्याएँ हुई ,
महलों को तोडा गया ,
खड़ी फसलों को काटा गया ,
घरो को हथियाया गया ,
तथाकथित सामंतवादी भाग खड़े हुए ,
उन्होंने देश ,दुनियाँ छोड़ दी ,
कई साल बीत गए ,
जब सामंतवादी नहीं रहे  ,
फिर भी इनकी भूख ख़त्म नहीं हुई ,
फिर भी बदहाली कायम रही  ,
फिर  भी घर में रोटी नहीं।
तब सत्ता ने मुफ्त में अनाज देना शुरू किया ,
आरक्षण देना शुरू किया ,
अनुदान देना शुरू किया ,
बड़े -बड़े वादे करने शुरू किये ,
हसीन सपने बेचने शुरू किये ,
फिर भी बदहाली कायम रही  ,
फिर  भी घर में रोटी नहीं।
काश ! काश की सत्ता सिखाती ,
कि कमाओ ,मेहनत करो ,
पसीना बहाओ ,
पढ़ो ,काबिल बनो।,
काश ! काश की सत्ता अब भी जाग जाए ,
काश जनता अब भी समझ जाए। 

उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं

जहाँ मानव की पहचान जाति हैं ,
जहाँ विवेक पर भरी लाठी हैं ,
जहाँ की जनता परदेश की रोटी खाती हैं ,
जहाँ जवानी परदेश में बीतती हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं। 
जहाँ हर घर में नेता हैं ,
जहाँ हर घर में बुद्धिजीवी हैं ,
जहाँ चर्चा राष्ट्र से कम पर होती नहीं ,
जहाँ हर इंसान अंदर से रोता हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं।
जहाँ घनानंदो का शासन हैं ,
जहाँ चाणक्य भटक कर आ जाते हैं ,
जहाँ बुद्ध -महावीर जन्म पाते हैं ,
जहाँ आज भी शांति का इन्तजार हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं।
जहाँ सत्ता बदलती हैं ,जीवन -स्तर नहीं बदलता ,
जहाँ आज़ादी मिलती हैं ,गुलामी नहीं छूटता ,
जहाँ वादा तो रोज होता हैं ,अमल नहीं होता ,
जहाँ चुनाव तो होता हैं,सरकार नहीं बनता ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं। 

Tuesday, September 15, 2015

सच के साथ सम्मान नहीं मिलता

सच के साथ सम्मान नहीं मिलता ,
दिशा भटकने से रोजगार नहीं मिलता ,
करोड़ो का दान देने वालों अमीरों के घर ,
अपनी माँ के लिए एक रोशनदान नहीं मिलता। 

विपति जब भी आती हैं

विपति जब भी आती हैं ,
अकेले नहीं आती ,
पुरे लाव -लश्कर के साथ आती हैं ,
ग्रह -नक्षत्र बिगड़ जाते हैं ,
और मित्र बदल जाते हैं ,
नजरिया बदल जाता हैं ,
आधा भरा गिलास ,आधा खाली हो जाता हैं ,
जिस रश्मि से आप पथ पाते थे ,
उसी से अब आँख चैधिया जाता हैं ,
जो पत्थर आपका सहारा था ,
वो सड़क का रोड़ा बन जाता हैं ,
विपति जब भी आती हैं ,
अकेले नहीं आती ,
पुरे लाव -लश्कर के साथ आती हैं.
Copyright@@ sankalp mishra

Sunday, September 13, 2015

ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।

ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार ,
जूता -मोजा सूट -बूट ले के तेल चले चले दरबार ,
सही -गलत ,गलत -सही लाला की बात हाँ जी हाँ ,
आधी रोटी आधा पेट कभी न होते साहब लेट ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।
सपने हुये पराये ,वजूद हुये अँधेरे के साये ,
दिन -रात सुबह -शाम कोल्लू के बैल गए बनाये ,
रोटी -कपडा ,मकान के चक्कर में जीवन हुआ बेकार ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।
पापा के दुलार के बदले खाते लाला की फटकार ,
कर लो तुम कितना भी काम अगले दिन सब बेकार ,
समझ न पाये लाला तुम जीवन के अब सार ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।