Tuesday, September 22, 2015

उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं

जहाँ मानव की पहचान जाति हैं ,
जहाँ विवेक पर भरी लाठी हैं ,
जहाँ की जनता परदेश की रोटी खाती हैं ,
जहाँ जवानी परदेश में बीतती हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं। 
जहाँ हर घर में नेता हैं ,
जहाँ हर घर में बुद्धिजीवी हैं ,
जहाँ चर्चा राष्ट्र से कम पर होती नहीं ,
जहाँ हर इंसान अंदर से रोता हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं।
जहाँ घनानंदो का शासन हैं ,
जहाँ चाणक्य भटक कर आ जाते हैं ,
जहाँ बुद्ध -महावीर जन्म पाते हैं ,
जहाँ आज भी शांति का इन्तजार हैं ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं।
जहाँ सत्ता बदलती हैं ,जीवन -स्तर नहीं बदलता ,
जहाँ आज़ादी मिलती हैं ,गुलामी नहीं छूटता ,
जहाँ वादा तो रोज होता हैं ,अमल नहीं होता ,
जहाँ चुनाव तो होता हैं,सरकार नहीं बनता ,
उस मरुभूमि का नाम बिहार हैं। 

Tuesday, September 15, 2015

सच के साथ सम्मान नहीं मिलता

सच के साथ सम्मान नहीं मिलता ,
दिशा भटकने से रोजगार नहीं मिलता ,
करोड़ो का दान देने वालों अमीरों के घर ,
अपनी माँ के लिए एक रोशनदान नहीं मिलता। 

विपति जब भी आती हैं

विपति जब भी आती हैं ,
अकेले नहीं आती ,
पुरे लाव -लश्कर के साथ आती हैं ,
ग्रह -नक्षत्र बिगड़ जाते हैं ,
और मित्र बदल जाते हैं ,
नजरिया बदल जाता हैं ,
आधा भरा गिलास ,आधा खाली हो जाता हैं ,
जिस रश्मि से आप पथ पाते थे ,
उसी से अब आँख चैधिया जाता हैं ,
जो पत्थर आपका सहारा था ,
वो सड़क का रोड़ा बन जाता हैं ,
विपति जब भी आती हैं ,
अकेले नहीं आती ,
पुरे लाव -लश्कर के साथ आती हैं.
Copyright@@ sankalp mishra

Sunday, September 13, 2015

ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।

ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार ,
जूता -मोजा सूट -बूट ले के तेल चले चले दरबार ,
सही -गलत ,गलत -सही लाला की बात हाँ जी हाँ ,
आधी रोटी आधा पेट कभी न होते साहब लेट ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।
सपने हुये पराये ,वजूद हुये अँधेरे के साये ,
दिन -रात सुबह -शाम कोल्लू के बैल गए बनाये ,
रोटी -कपडा ,मकान के चक्कर में जीवन हुआ बेकार ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।
पापा के दुलार के बदले खाते लाला की फटकार ,
कर लो तुम कितना भी काम अगले दिन सब बेकार ,
समझ न पाये लाला तुम जीवन के अब सार ,
ये हैं लाला के गुलाम ,सुबह -सुबह हो गए तैयार।

Saturday, May 30, 2015

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी
निगाहो में उलझन, दिलों में उदासी
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जहाँ एक खिलौना है, इंसान की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से मौत सस्ती 
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जवानी भटकती है बदकार बन कर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहाँ प्यार होता है व्योपार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है
यहाँ प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है

जला दो इसे, फूँक डालो ये दुनिया
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
गीतकार : साहिर लुधियानवी, गायक : मोहम्मद रफी, संगीतकार : सचिनदेव बर्मन, 
चित्रपट : प्यासा (१९५७) / Lyricist : Saahir Ludhiyanvi, Singer : 
Mohammad Rafi, Music Director : Sachindev Burman, Movie :  

Monday, March 9, 2015

मौत मेरी संगनी ,मौत मेरी प्रेमिका

मौत मेरी संगनी ,मौत मेरी प्रेमिका
मौत के आगोश में पुलकित मेरी कविता।
मौत मेरी आशा ,मौत मेरा वादा ,
मौत के आस्था में डूबी मेरी तूलिका।
मौत मेरा एतबार ,मौत मेरा इन्तजार ,
मौत के मधुरस से पोषित मेरी रीतिका।
मौत मेरा विश्वास ,मौत मेरा धौर्य ,
मौत के पराक्रम से आलोकित मेरी कृतिका।
मौत मेरा शौर्य ,मौत मेरा सौंदर्य ,
मौत के बोझ तलें दबी मेरी सफलता।
मौत मेरा भाग्य ,मौत मेरा आलस्य ,
मौत के पहले मर चुकी महत्वकांझा।
मौत मेरी पूजा ,मौत मेरी पवित्ररता ,
मौत के आगे नतमष्तक पौरुष देवता।

Thursday, December 18, 2014

मैच -फ़िक्सर देखो बन बैठा क्रिकेट कप्तान

समरथ के ना दोष गोसाई चाहे करो कोई काम ,
मैच -फ़िक्सर देखो बन बैठा क्रिकेट कप्तान।
सीना ठोक के कह रहे जो कर सके वो कर ,
हम तो दिन -दहाड़े लूटेंगे तेरे भावना और सम्मान।